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Bihar News: Cyber Crime: एक ID पर 9 से ज्यादा SIM लेने वालों पर होगी कार्रवाई, DGP विनय कुमार ने दी सख्त चेतावनी

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Alam Ki Khabar | Bihar News | Patna News | Cyber Crime | बिहार DGP विनय कुमार ने साइबर क्राइम के खिलाफ सख्त कार्रवाई की चेतावनी दी है। एक ID पर 9 से अधिक SIM और फर्जी आधार कार्ड बनाने वालों पर कार्रवाई की जाएगी।

समस्तीपुर, 14 अगस्त। आलम की खबर: बिहार में बढ़ते साइबर अपराध के बीच पुलिस ने मोबाइल SIM और फर्जी पहचान दस्तावेजों के दुरुपयोग के खिलाफ कार्रवाई तेज करने के संकेत दिए हैं। बिहार के डीजीपी विनय कुमार ने पटना में प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कहा कि एक ID पर निर्धारित सीमा से अधिक SIM लेने वालों की पहचान की जा रही है और नियमों का उल्लंघन करने वालों पर कार्रवाई होगी।

डीजीपी ने फर्जी आधार कार्ड तैयार करने वाले लोगों के खिलाफ भी सख्त कदम उठाने की बात कही। उन्होंने साइबर अपराध को लगातार बदलती चुनौती बताते हुए कहा कि इसका असर केवल पुलिस व्यवस्था पर नहीं, बल्कि पूरे समाज पर पड़ रहा है।

एक ID पर 9 से ज्यादा SIM पर नजर

प्रेस कॉन्फ्रेंस में डीजीपी विनय कुमार ने बताया कि एक ही पहचान पत्र पर बड़ी संख्या में SIM जारी किए जाने के मामले सामने आए हैं। उन्होंने कहा कि नियम के मुताबिक एक ID पर 9 से ज्यादा SIM जारी नहीं किए जाने चाहिए।

पुलिस अब ऐसे मामलों की जांच कर रही है, जहां एक ही पहचान पत्र पर निर्धारित सीमा से अधिक मोबाइल कनेक्शन लिए गए हैं। जांच के बाद संदिग्ध लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

डीजीपी ने बताया कि कुछ मामलों में एक ID पर 50 से 100 तक SIM जारी होने की जानकारी सामने आई है। इससे यह सवाल भी उठता है कि इन कनेक्शनों का इस्तेमाल किस उद्देश्य के लिए किया गया और संबंधित प्रक्रिया में नियमों का पालन हुआ या नहीं।

फर्जी आधार बनाने वालों पर भी शिकंजा

साइबर अपराध के लिए फर्जी पहचान तैयार करने वाले नेटवर्क पर भी पुलिस की नजर है। डीजीपी ने बताया कि फर्जी आधार कार्ड बनाने के मामले में करीब 100 लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई है।

पुलिस इस बात की जांच कर रही है कि फर्जी दस्तावेजों के जरिए कितने लोगों ने मोबाइल कनेक्शन या अन्य सुविधाएं हासिल कीं और उनका इस्तेमाल किन गतिविधियों में किया गया।

सुपौल के हर्षित मिश्रा का मामला बना उदाहरण

डीजीपी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में सुपौल जिले के गौसपुर गांव के रहने वाले 21 वर्षीय हर्षित कुमार मिश्रा से जुड़े मामले का भी जिक्र किया।

पुलिस के अनुसार, हर्षित पर सिम बॉक्स के जरिए अंतरराष्ट्रीय साइबर फ्रॉड नेटवर्क चलाने का आरोप लगा था। जांच में उसके ठिकाने से बड़ी संख्या में SIM कार्ड और सिम बॉक्स उपकरण बरामद किए गए थे।

डीजीपी ने इस मामले का उल्लेख करते हुए बताया कि एक छोटे से गांव में बैठकर तकनीक के जरिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर साइबर गतिविधियां संचालित किए जाने की जानकारी सामने आई थी।

पुलिस के अनुसार, हर्षित ने विदेशों से उपकरण मंगाकर अपने घर में सिम बॉक्स का सेटअप तैयार किया था। जांच एजेंसियों को उसके विदेशी संपर्कों और साइबर गतिविधियों से जुड़े नेटवर्क की भी जानकारी मिली।

रोज हजारों कॉल और संदेश का आरोप

जांच के दौरान पुलिस ने आरोप लगाया था कि सिम बॉक्स के जरिए बड़ी संख्या में कॉल और संदेश भेजे जाते थे। इसी तकनीक का इस्तेमाल कथित तौर पर अंतरराष्ट्रीय साइबर फ्रॉड नेटवर्क के लिए किया जा रहा था।

पुलिस के मुताबिक, हर्षित के संपर्क ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के माध्यम से विदेशों में मौजूद साइबर अपराधियों से बने थे। इसके बाद उसने तकनीकी उपकरणों और साइबर गतिविधियों से जुड़े तौर-तरीकों को समझकर अपना नेटवर्क तैयार किया।

करोड़ों की संपत्ति की जांच

जांच एजेंसियों के अनुसार, हर्षित के मामले में करोड़ों रुपये की संपत्ति और निवेश से जुड़े तथ्य भी सामने आए थे। पुलिस ने उसकी चल-अचल संपत्ति, विदेशों में निवेश और डिजिटल करेंसी से जुड़े लेनदेन की भी पड़ताल की थी।

जांच में मोतिहारी में करोड़ों रुपये की अचल संपत्ति और विदेशों में निवेश से जुड़े दावों की भी जांच की गई। हालांकि इन सभी वित्तीय पहलुओं की अंतिम स्थिति जांच और कानूनी प्रक्रिया पर निर्भर करेगी।

घर से बरामद हुए थे कई उपकरण

बिहार पुलिस की आर्थिक अपराध इकाई ने दूरसंचार विभाग के साथ मिलकर हर्षित के ठिकाने पर छापेमारी की थी। पुलिस के मुताबिक, कार्रवाई के दौरान उसके घर से 8 सिम बॉक्स डिवाइस, 1,300 से अधिक SIM कार्ड, बायोमेट्रिक मशीन और पैसे गिनने की मशीन बरामद की गई थी।

मामले के अंतरराष्ट्रीय पहलुओं को देखते हुए अन्य केंद्रीय जांच एजेंसियों से भी समन्वय किए जाने की बात सामने आई थी।

साइबर अपराध अब बड़ी सामाजिक चुनौती

डीजीपी विनय कुमार ने कहा कि साइबर अपराध का स्वरूप लगातार बदल रहा है। अपराधी तकनीक का इस्तेमाल कर एक जगह बैठकर दूसरे राज्य या दूसरे देश में लोगों को निशाना बना सकते हैं।

ऐसे मामलों में मोबाइल SIM, फर्जी दस्तावेज, बैंकिंग माध्यम और डिजिटल प्लेटफॉर्म का दुरुपयोग जांच एजेंसियों के लिए बड़ी चुनौती बन रहा है।

डीजीपी ने बताया कि बिहार में साइबर अपराध से जुड़े 7,000 से अधिक मामले दर्ज किए जा चुके हैं। पुलिस इन मामलों की जांच के साथ-साथ ऐसे नेटवर्क को चिन्हित करने में जुटी है, जो साइबर अपराध के लिए तकनीकी संसाधनों की व्यवस्था करते हैं।

परिवार और समाज की जिम्मेदारी भी अहम

हर्षित मामले का उल्लेख करते हुए डीजीपी ने समाज की भूमिका पर भी सवाल उठाया। उनका कहना था कि यदि किसी व्यक्ति की आर्थिक स्थिति अचानक असामान्य तरीके से बदलती है और उसके पास कम समय में बड़ी संपत्ति दिखाई देने लगती है, तो आसपास के लोगों को भी सतर्क रहना चाहिए।

साइबर अपराध को रोकने के लिए केवल पुलिस कार्रवाई पर्याप्त नहीं है। संदिग्ध गतिविधियों की जानकारी समय रहते पुलिस तक पहुंचना भी जरूरी है।

SIM लेने वालों के लिए भी चेतावनी

पुलिस की कार्रवाई का संदेश आम मोबाइल उपभोक्ताओं के लिए भी महत्वपूर्ण है। किसी दूसरे व्यक्ति के नाम पर SIM लेना, अपनी ID का गलत इस्तेमाल होने देना या बड़ी संख्या में SIM लेकर उन्हें किसी अन्य व्यक्ति को सौंपना आगे चलकर कानूनी परेशानी का कारण बन सकता है।

इसी वजह से पुलिस अब ऐसे मोबाइल कनेक्शनों की जांच पर विशेष ध्यान दे रही है, जिनका इस्तेमाल संदिग्ध गतिविधियों में होने की आशंका है।

डिजिटल अपराध के खिलाफ लंबी लड़ाई

बिहार में साइबर अपराध के बढ़ते मामलों ने पुलिस के सामने नई चुनौती खड़ी की है। अपराधी अब पारंपरिक तरीकों के साथ-साथ तकनीकी उपकरणों और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क का इस्तेमाल कर रहे हैं।

ऐसे में SIM जारी करने की प्रक्रिया, पहचान दस्तावेजों की सुरक्षा और संदिग्ध डिजिटल गतिविधियों की निगरानी को मजबूत करना जरूरी है।

डीजीपी विनय कुमार की चेतावनी से साफ है कि बिहार पुलिस अब साइबर अपराध के साथ-साथ उसके लिए आधार तैयार करने वाले नेटवर्क पर भी कार्रवाई का दायरा बढ़ाने की तैयारी में है।

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साइबर अपराध रोकने के लिए पुलिस के साथ समाज को भी जागरूक होना होगा

साइबर अपराध अब केवल ऑनलाइन ठगी तक सीमित नहीं रह गया है। तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल के साथ अपराधियों ने SIM बॉक्स, फर्जी पहचान दस्तावेज और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क जैसे तरीकों का इस्तेमाल शुरू कर दिया है। ऐसे मामलों में पुलिस की सख्ती जरूरी है, लेकिन केवल कार्रवाई से समस्या पूरी तरह खत्म नहीं होगी।

मोबाइल SIM जारी करने की प्रक्रिया में नियमों का पालन, फर्जी दस्तावेज तैयार करने वालों पर कार्रवाई और संदिग्ध कनेक्शनों की समय रहते पहचान बेहद जरूरी है। इसके साथ आम लोगों को भी अपनी ID और मोबाइल कनेक्शन की सुरक्षा को लेकर सतर्क रहना होगा।

सुपौल जैसे मामलों से यह सवाल भी उठता है कि यदि किसी व्यक्ति की आर्थिक स्थिति अचानक बदलती है या उसके घर से संदिग्ध तकनीकी गतिविधियां संचालित होती हैं, तो समाज और परिवार की जिम्मेदारी क्या होनी चाहिए। अपराध की जानकारी छिपाने के बजाय समय पर पुलिस को सूचना देना बड़े नेटवर्क को शुरुआती स्तर पर रोक सकता है।

डिजिटल युग में साइबर सुरक्षा केवल पुलिस की जिम्मेदारी नहीं है। सरकार, दूरसंचार कंपनियों, बैंकिंग संस्थानों और आम नागरिकों को मिलकर ऐसी व्यवस्था मजबूत करनी होगी, जिसमें तकनीक का इस्तेमाल सुविधा के लिए हो, अपराध के लिए नहीं।

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